Thursday, 31 July 2014

जब अंगुलीमाल मर गया तो, 
और भिक्षुओं ने पूछा बुद्ध को, 
भंते! अंगुलीमाल मरकर कहां उत्पन्न हुए? 
बुद्ध ने कहा, भिक्षुओ, 
मेरा वह पुत्र परिनिवृत्त हो गया, 
परिनिर्वाण को उपलब्ध हो गया है। 
अब उसका जन्म नहीं होगा। 
वह जन्म-मरण के पार हो गया है। 
अब वह वापस नहीं लौटेगा। 
भंते, भिक्षुओं ने कहा, 
इतने मनुष्यों को मार कर ? 
भिक्षुओं को भरोसा न आया। 
ऐसा पापी परिनिर्वाण को उपलब्ध हो गया! 
हां भिक्षुओ, बुद्ध ने कहा, 
सोए-सोए उसने बहुत पाप किए, 
लेकिन जागकर पुण्यों से उसने उन्हें काट डाला। 
ऐसे वह शून्यभाव में डूबकर, 
निर्वाण को उपलब्ध हो गया है। 

लेकिन भिक्षुओं ने फिर पूछा, 
भगवान! 
उसे तो ज्यादा समय भिक्षु हुए भी नहीं हुआ, 
उसने पुण्य किए कहां? 
बुद्ध ने कहा, 
कभी-कभी एक पुण्य का छोटा सा कृत्य भी अगर, समग्रता से किया जाए तो, 
सारे पापों को काट डालता है। 
नहीं उसे ज्यादा दिन लगे, 
नहीं ज्यादा दिन वह जीआ, 
लेकिन जब लोग उसे पत्थर मार रहे थे तब, 
वह साक्षी बना रहा, 
यह सबसे बड़ा पुण्य-कृत्य है। 
कर्ता होने में पाप है, 
साक्षी होने में पुण्य है; 
ऐसी अपूर्व बात बुद्ध ने कही। 
ओशो  जय भगवान !! 

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