SANKLAN

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Saturday, 12 July 2014


एक यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ सड़क पर चल रहा था. जब वे एक विशालकाय पेड़ के पास से गुज़र रहे थे तब उनपर आसमान से बिजली गिरी और वे तीनों तत्क्षण मर गए. लेकिन उन तीनों को यह प्रतीत नहीं हुआ कि वे अब जीवित नहीं है और वे चलते ही रहे. कभी-कभी मृत प्राणियों को अपना शरीरभाव छोड़ने में समय लग जाता है.

उनकी यात्रा बहुत लंबी थी. आसमान में सूरज ज़ोरों से चमक रहा था. वे पसीने से तरबतर और बेहद प्यासे थे. वे पानी की तलाश करते रहे. सड़क के मोड़ पर उन्हें एक भव्य द्वार दिखाई दिया जो पूरा संगमरमर का बना हुआ था. द्वार से होते हुए वे स्वर्ण मढ़ित एक अहाते में आ पहुंचे. अहाते के बीचोंबीच एक फव्वारे से आईने की तरह साफ़ पानी निकल रहा था.
यात्री ने द्वार की पहरेदारी करनेवाले से कहा:
“नमस्ते, यह सुन्दर जगह क्या है?
“यह स्वर्ग है”.
“कितना अच्छा हुआ कि हम चलते-चलते स्वर्ग
आ पहुंचे. हमें बहुत प्यास लगी है.”
“तुम चाहे जितना पानी पी सकते हो”.
“मेरा घोड़ा और कुत्ता भी प्यासे हैं”.
“माफ़ करना लेकिन यहाँ जानवरों को पानी पिलाना मना है”
यात्री को यह सुनकर बहुत निराशा हुई. वह खुद बहुत प्यासा था लेकिनअकेला पानी नहीं पीना चाहता था. उसने पहरेदार को धन्यवाद दिया और अपनी राह चल पड़ा. आगे और बहुत दूर तक चलने के बाद वे एक बगीचे तक पहुंचे जिसका दरवाज़ा जर्जर था और भीतर जाने का रास्ता धूल से पटा हुआ था. भीतर पहुँचने पर उसने देखा कि एक पेड़ की छाँव में एक आदमी अपने सर को टोपी से ढंककर
सो रहा था.
“नमस्ते” – यात्री ने उस आदमी से कहा – “मैं, मेरा घोड़ा और कुत्ता बहुत प्यासे हैं. क्या यहाँ पानी मिलेगा?”
उस आदमी ने एक ओर इशारा करके कहा –“वहां चट्टानों के बीच पानी का एक सोता है. जाओ जाकर पानी पी लो.” यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ वहां पहुंचा और तीनों ने जी भर के अपनी प्यास बुझाई. फिर यात्री उस आदमी को धन्यवाद
कहने के लिए आ गया.
“यह कौन सी जगह है?”
“यह स्वर्ग है”.
“स्वर्ग? इसी रास्ते में पीछे हमें एक संगमरमरी अहाता मिला, उसे भी वहां का पहरेदार स्वर्ग बता रहा था!”
“नहीं-नहीं, वह स्वर्ग नहीं है. वह नर्क है”.
यात्री अब अपना आपा खो बैठा. उसने कहा – “भगवान के लिए ये सब कहना बंद करो! मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है कि यह सब क्या है!”
आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा – “नाराज़ न हो भाई, संगमरमरी स्वर्ग वालों का तो हमपर बड़ा उपकार है. वहां वे सभी लोग रुक जाते हैं जो अपने भले के लिए अपने सबसे अच्छे दोस्तों को भी छोड़ सकते हैं.
एक गाँव से गुज़रता था, एक छोटा सा बच्चा दिया लेकर जा रहा था.
पूछा उससे, “कहाँ जाते हो दिया लेकर?”
उसने कहा, “मंदिर जाना है.”
तो मैंने उससे कहा, “तुमने जलाया है दिया?”
तो उसने कहा, “मैंने ही जलाया है.”
मैंने पूछा, “जब तुमने ही जलाया है, तो तुम्हें पता होगा कि रोशनी कहाँ से आयी है? बता सकते हो?”
तब उस बच्चे ने नीचे से ऊपर तक मुझे देखा. फूंक मारकर रोशनी बुझा दी और कहा, “अभी आपके सामने चली गयी. बता सकते हैं कहाँ चली गयी? तो मैं भी बता दूंगा कि कहाँ से आयी थी. तो मैं सोचता हूँ, वहीं चली गयी होगी जहां से आयी थी.” उस बच्चे कहा, “कहाँ चली गयी होगी?”
तो, उस बच्चे के पैर छूने पड़े. और कोई उपाय न था. नमस्कार करना पड़ा कि तू अच्छा मिल गया. हमने तो मजाक किया था, लेकिन मजाक उलटा पड़ गया. बहुत भारी पड़ गया. अज्ञान इस बुरी तरह से दिखाई पड़ा, लेकिन ज्योति का पता नहीं चला कि कहाँ से आती है और कहाँ जाती है! और हम बड़े ज्ञान की बातें किये जा रहे हैं. उस दिन से मैंने ज्ञान की बातें करना बंद कर दिया.
क्या फायदा? जब एक ज्योति का पता नहीं तो भीतर की ज्योति की बातें करने में मैं चुप रहने लगा. उस बच्चे ने चुप करवाया.
हज़ारों किताबें पढीं, जिनमें लिखा था कि मौन रहो. नहीं रहा, लेकिन उस बच्चे ने ऐसा चुप करवा दिया कि कई वर्ष बीत गए, मैं नहीं बोला. लोग पूछते थे, बोलो. तो मैं लिख देता था कि दिए की ज्योति कहाँ जाती है, बताओ? मतलब क्या है बोलने का? कुछ पता नहीं है तो बोलूं क्या?
तो इसको मैं कहता हूँ ‘एटीट्यूड ऑफ लर्निंग और डिसाईपलशिप’, शिष्यत्व. गुरू को बिलकुल नहीं होना चाहिए दुनिया में, सब शिष्य होने चाहिए. और अभी हालत ये है कि गुरू सब हैं, शिष्य खोजना बहुत मुश्किल है!
(प्रवचन - सम्बोधि के क्षण मुम्बई, १४.०९.१९६९)
ओशो का संदेश हैः
संसार को इतना प्रेम करो कि संसार में परमात्मा को पा सको। कहीं और कोई परमात्मा नहीं है। अपने को अंगीकार करो। अपने को अस्वीकार मत करो। तुम जैसे हो भले हो। उसके हस्ताक्षर तुम्हारे ऊपर हैं। तुम उसकी निर्मित्ति हो। इसलिए जीवन का परम स्वीकार है !

સારા માણસે સારા દેખાવવું નથી પડતું,
બૂરા માણસે એ સાબિત કરવું પડે છે કે હું સારો છું.  
-- અજ્ઞાત

એક લમ્હા ભી મુસર્રત કા બહુત હોતા હૈ,
લોગ જિનેકા સલીકા હી કહાં રખતે હૈ!
-સૈયદ ઝમીર જાફરી








 Knitted Food









એક
મીઠી માટીની
ભીની ખુશ્બુ થી તરબર અલ્હાદાયક
ઉતેજીત સવાર ..
નવી ઉમંગો
નવા તરંગો
નવા વિચારો
સંગ એક નવો દિવસ મુબારક ...

મિત્રો
જીલો ...કરલો અપને ખ્વાબ પૂર્ણ .

આ કૂકડાનું કુકડે કૂક ને આ પક્ષીઓનો કલરવ
નક્કી આ સુર્યની સવારી લાગે છે ..

આ ઇન્દ્રધનુંષી રંગો રેલાયા છે આભમાં
આ સોનેરી પ્રભાતની રંગત મને સારી લાગે છે ..

આ રંગબેરંગી પતંગિયું આમ ઉડ્યા કરે છે ફૂલો પર
આ પતંગિયાની પ્રીત મને અનેરી લાગે છે…

પરોઢના એ સૂરજ ! હવે તપતો નહિ તું
ફૂલો પરની આ ‘શબનમ’ મને પ્યારી લાગે છે ..

આવે છે માટીની મીઠી સુગંધ ને આ લહેરાતો ઠંડો પવન
આ હવાની હેલી મને ન્યારી લાગે છે ..

ઉઠીને પ્રથમ આભાર માનું હું તારો ઓ ખુદા !
તારી બનાવેલી આ દુનિયા મને નિરાલી લાગે છે ..

હે ખુદા! આ બધી સુંદરતા તારી જ દેન છે
ને તને જ આ બધું આભારી લાગે છે…
તને જ આ બધું આભારી લાગે છે ….

---- દિલીપ સોમૈયા 
तुलसी की जगह मनी प्लांट
ने ले ली..!
चाची की जगह आंटी ने
ले ली..!
पिता जी डेड हो गये..!
भाई तो अब ब्रो हो गये..!
बेचारी बेहन भी अब सिस
हो गयी..!
दादी की लोरी तो अब
टांय टांय फिस्स हो गयी..!
टी वी के सास बहू में भी
अब साँप नेवले का रिश्ता है..!
पता नहीं एकता कपूर
औरत है या फरिश्ता है..!
जीती जागती माँ बच्चों के
लिए ममी हो गयी..!
रोटी अब अच्छी कैसे लगे
मैग्गी जो इतनी यम्मी हो गयी..!
गाय का आशियाना अब
शहरों की सड़कों पर बचा है..!
विदेशी कुत्तों ने लोगों के
कंधों पर बैठकर इतिहास
रचा है..!
बहुत दुखी हूँ ये सब देखकर
दिल टूट रहा है..!
हमारे द्वारा ही हमारी
भारतीय सभ्यता का साथ छूट रहा है.....













આ બ્લોગ પર મુકાયેલ તમામ વિગતો માંથી મારી એક પણ રચના, કાવ્ય, લેખો,

કે અન્ય પિક્ચર્સ વગેર મારા નહીં હોય,

હું ફક્ત સંકલન કરી એમાં જે કંઈ થોડું યોગ્ય ફેરફાર કરવા જેવું લાગે તો,

તે પ્રમાણે ફેરફાર કરી ને આ બ્લોગ પર પોસ્ટ કરીશ,

મારી અજાણતા, કે ભૂલચૂક થી, જો કોઈ પણ લેખ,

કાવ્ય વગેરે કોપી રાઈટ નો ભંગ થતો લાગે તો આપ કવિઓ કે લેખકોને મારી

નમ્ર વિનંતી કે મને આપ જણાવશો, જેથી હું તેને આ મારા બ્લોગ પરથી દુર કરી દઈશ.

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અને મારા બ્લોગ પર આવવા બદલ આપનો ખુબ ખુબ આભાર વ્યક્ત કરું છું. !!

- DINESH GOGARI