SANKLAN
DINESH GOGARI'S BLOG
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Thursday, 31 July 2014
तू एक बार मुझको पुकार
बस एक बार मुझको पुकार।
मन के साध न सध पाये, यौवन की हाला रीत गयी
स्वर भंग आलाप न ले पाया, निष्ठुर खामोशी जीत गयी
थक गया एकाकी थाम मुझे
मैं इस जीवन से गया हार।
कितने हलाहल वर्ष पिये, घन-तिमिर से निकला ना प्रभात
कितने ही झंझावातों ने, आ चूमे ये रूखे गात
अब चलाचली की बेला है
आ जाने दे कुछ तो निखार।
सौ-सौ जन्मों के पुण्य कहाँ, कि हो पात तुमसे मिलाप
नियति से उपहार मिला है, रंग-रंग में मुझको विलाप
अब प्रणय यज्ञ सध जाने दे
धुल जाये सब मन के विकार।
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